जॉर्ज फर्नांडिस, श्रमिकों का तारणहार- शरद पवार नें उजागर की जॉर्ज की यादें…

Sharad Pawar and george fernandes

खा. शरद पवार | 26 जून 2025

वरिष्ठ श्रमिक नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस को मानने वाले समाजवादी विचारधारा की श्रमिक संघटनाओं के संयुक्त सम्मेलन में ‘जॉर्ज’ नामक एक तेजस्वी नेता की स्मृतियों को ताज़ा किया गया और यह रेखांकित किया गया कि आज के संसदीय लोकतांत्रिक भारत में उनकी दृष्टि की कितनी आवश्यकता है।

आज के कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री. कपिल पाटील ने की। जॉर्ज साहब के साथ वर्षों काम करने वाले सुभाष म्हाळगी, संजीव पुजारी, शंकरराव साळवी, अन्य सहयोगियों और उपस्थित भाइयों-बहनों…

आज हम देश की राजनीति की एक तूफानी शख्सियत को याद कर रहे हैं। आज का दिन – 25 जून – स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक ऐसा दिन है, जब इस देश के नागरिकों ने पहली बार लोकतांत्रिक अधिकारों पर बड़ा संकट देखा। यह दिन हमारे लोकतंत्र के लिए एक दुर्भाग्यपूर्ण दिन था। लेकिन इस अंधकारमय समय में भी, लोकतंत्र के समर्थकों ने बदलाव के लिए आवश्यक हर त्याग करने की तैयारी दिखाई। उनमें जॉर्ज फर्नांडिस का उल्लेख अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए।

एक बेहद रोचक व्यक्तित्व – जन्म मैंगलोर का, लेकिन आए मुंबई! यहां कोई घर नहीं, कोई ठिकाना नहीं। कभी रेलवे प्लेटफॉर्म पर तो कभी कहीं और सिर रखने की जगह नहीं। बेहद कठिन परिस्थितियों में उनका शुरुआती जीवन बीता। लेकिन उन्होंने एक बात तय कर ली – श्रमिकों और मेहनतकश लोगों के हित की रक्षा ही उनका जीवन-सूत्र होगा। हम अक्सर मिलते थे, चर्चा करते थे। उनसे बात करने में यह देखकर आश्चर्य होता था कि बिना किसी बड़ी शैक्षणिक या आर्थिक पृष्ठभूमि के, वे इतने बहुभाषी थे। उनकी मातृभाषा तुलु और कोंकणी थी, लेकिन उन्हें उर्दू, कन्नड़, मराठी, हिंदी और अंग्रेज़ी पर भी जबरदस्त पकड़ थी। उस दौर में दो ही नेता मुझे याद आते हैं जो इतनी भाषाओं में पारंगत थे – नरसिंह राव और जॉर्ज फर्नांडिस।

जॉर्ज का घर वास्तव में किताबों का घर था। कहीं और कुछ नहीं मिलेगा, लेकिन किताब जरूर होगी। कई बार देखा कि जब वे दिल्ली से मुंबई आते थे, तो हमेशा आखिरी फ्लाइट लेते थे, और उसमें भी आखिरी सीट पर बैठते थे – भले ही वे मंत्री थे! कभी उन्हें फर्स्ट क्लास में बैठे नहीं देखा। उनके पास होता – कोई फाइल या कोई किताब। एक पल भी व्यर्थ नहीं जाने देना, यही उनका नियम था। विचारधारा के स्तर पर भी उनकी सोच बेहद स्पष्ट थी। इसका कारण था – डॉ. राममनोहर लोहिया, आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण जैसे महान नेताओं के विचारों से उनका जुड़ाव।

मुंबई आने के बाद वे रणजीत भानू के घर में रहते थे। उन्होंने ‘मुंबई के मेहनतकशों की भलाई ही हमारा संकल्प’ यह अपना स्थायी सिद्धांत बनाया। आज हमने उनके कई साथियों का सम्मान किया – जिन्होंने जॉर्ज का साथ दिया और मजदूरों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। मुंबई में चाहे इंश्योरेंस कर्मचारी यूनियन हो, टैक्सी यूनियन हो या अन्य मज़दूर संगठनों की नींव रखने में जॉर्ज का नाम सबसे पहले लिया जाएगा, इसमें कोई संदेह नहीं।

उन्होंने कभी रचनात्मक दृष्टिकोण नहीं छोड़ा। इसका सबसे अच्छा उदाहरण है ‘बॉम्बे लेबर को-ऑपरेटिव बैंक’। इस बैंक की स्थापना में उनका प्रमुख योगदान था। यह बैंक आज भी मज़दूरों के संकट के समय उनका साथ देती है।

आपातकाल का दौर जॉर्ज के जीवन का सबसे कठिन समय था। वे भूमिगत हो गए, बड़ौदा डायनामाइट केस में शामिल रहे। इस कार्य के लिए उन्होंने साधन जुटाए, गिरफ्तार हुए, यातनाएं झेलीं। सरकार ने उनकी भूमिका को कोई सम्मान नहीं दिया। लेकिन पूरे देश में ऐसे हजारों लोग थे, जिनके विचार जॉर्ज जैसे थे, जिन्होंने लोकतंत्र की पुनर्स्थापना के लिए भारी बलिदान दिए।

मैं उस समय महाराष्ट्र विधानसभा में था। मुझे याद है – उस समय कांग्रेस पार्टी में भी बहुत से लोग असहज थे। हमने एक अलग विचारधारा प्रस्तुत की। कांग्रेस दो भागों में बंट गई – इंदिरा कांग्रेस और स्वर्ण सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस (एस)। हम कांग्रेस (एस) में शामिल हुए। उस समय महाराष्ट्र में जनता पार्टी को बहुमत नहीं मिला। कांग्रेस (आई) और कांग्रेस (एस) ने मिलकर सरकार बनाई। लेकिन हम असहज थे। हमें कांग्रेस (आई) के साथ सरकार में रहना स्वीकार नहीं था। जॉर्ज, चंद्रशेखर, मधु दंडवते जैसे नेताओं के साथ हमने निर्णय लिया – सरकार बदलनी है। और 1978 में मेरे नेतृत्व में नई सरकार बनी – जो आपातकाल की समर्थक नहीं थी। इस सरकार की स्थापना में जॉर्ज का बड़ा योगदान था।

उस समय जॉर्ज एक लोकप्रिय और ताकतवर नेता थे। संघर्ष करना हो, रेल रोको हो, मुंबई बंद करना हो – ये ताकद केवल जॉर्ज के पास थी। एक बार उन्होंने एस. के. पाटिल जैसे मुंबई के शक्तिशाली नेता के खिलाफ चुनाव लड़ने का फैसला लिया। शहर में पोस्टर लगे – “You Can Defeat Patil!” उन्होंने आम आदमी के लोकतांत्रिक अधिकारों को जागृत किया। और सचमुच, एस. के. पाटिल को हराकर जॉर्ज ने यह कर दिखाया।

जॉर्ज एक ऐसे नेता थे जिन्होंने सड़कों पर संघर्ष भी किया और केंद्र सरकार में मंत्री भी बने। रेल मंत्री, उद्योग मंत्री, रक्षा मंत्री – सभी भूमिकाओं में वे प्रभावशाली रहे। कोकण रेलवे का उदाहरण लें – उन्होंने कोकण रेलवे कॉर्पोरेशन नामक स्वतंत्र संस्था बनाने का निर्णय लिया। पैसे की कमी थी, लेकिन उन्होंने केंद्र और राज्यों से निवेश जुटाया। गोवा और केरल पैसे नहीं दे पाए, तो जॉर्ज ने मुझसे कहा – महाराष्ट्र को निवेश करना होगा, बाद में कॉर्पोरेशन पैसे वापस करेगा। हमने किया। और आज कोकण रेलवे का सपना साकार हुआ – इसका श्रेय जॉर्ज और मधु दंडवते को जाता है।

मुझे संतोष है कि एक ऐसा व्यक्ति, जिसके पास कोई पृष्ठभूमि नहीं थी, उसने अपना पूरा जीवन समाज और श्रमिकों को समर्पित किया। उन्होंने संकुचित राजनीति नहीं की – देश और समाज का विचार किया। जॉर्ज जैसा नेतृत्व हमने देखा।

आज हम जॉर्ज को श्रद्धांजलि दे रहे हैं। हमारी जिम्मेदारी है कि हम उनके विचारों को याद रखें और लोकतंत्र की रक्षा के लिए किसी भी कीमत पर खड़े रहें। आपातकाल में इंदिरा गांधी की गलती थी, लेकिन पराजय के बाद उन्होंने देश से क्षमा भी मांगी – यह भी हमें नहीं भूलना चाहिए।

आज फिर सावधान रहने का समय है। जो पत्रकार सच्चाई लिखते हैं, उन्हें फोन करके धमकाया जाता है। कहा जाता है – “ऐसी खबर मत छापो, लेख मत लिखो। आगे कुछ हुआ तो मत कहना!” यह एक अघोषित आपातकाल जैसी स्थिति है। इस पर विचार करने का समय आ गया है।

यदि हम जॉर्ज फर्नांडिस को सच में श्रद्धांजलि देना चाहते हैं, तो यह संकल्प लें – हम लोकतंत्र की रक्षा के लिए जो भी कीमत चुकानी पड़े, चुकाएंगे। यह देश लोकतांत्रिक रहेगा – यही हमारी प्रतिज्ञा होनी चाहिए।

कपिल पाटील, उनके सहयोगियों और जॉर्ज साहब के साथियों को धन्यवाद देता हूँ। हम सब एक साथ हैं। ज़रूरत पड़ी, तो सड़क पर उतरेंगे, और जॉर्ज के आदर्श को याद रखेंगे – यही मैं कहकर अपनी बात समाप्त करता हूँ।

धन्यवाद!

समाजवादी श्रमिक संगोष्ठी में शरद पवार का यह भाषण | के. सी. कॉलेज सभागार, मुंबई | 25 जून 2025

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