सागर भालेराव | २१ जून, २०२५
हाल ही में भारतीय चुनाव आयोग (ECI) ने एक निर्देश जारी किया है, जिसके अनुसार चुनाव प्रक्रिया के दौरान रिकॉर्ड किए गए CCTV, वेबकास्टिंग और अन्य वीडियो फुटेज को मतदान के 45 दिनों बाद नष्ट कर दिया जाएगा — यदि इस अवधि में कोई चुनाव याचिका दायर नहीं की जाती है। इस निर्णय ने व्यापक बहस को जन्म दिया है, जिसमें इसके इरादों, प्रभावों और भारत के लोकतंत्र पर इसके संभावित दुष्परिणामों पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
चुनाव आयोग का उद्देश्य और पृष्ठभूमि
चुनाव आयोग ने राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को पत्र लिखकर यह निर्देश जारी किया कि मतदान प्रक्रिया की इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्डिंग — जैसे CCTV, वेबकास्टिंग और अन्य वीडियो फुटेज — को 45 दिनों के भीतर नष्ट कर दिया जाए, जब तक कि उस समयावधि में कोई चुनाव याचिका कोर्ट में दर्ज न की गई हो।
आयोग का तर्क है कि सोशल मीडिया पर इस फुटेज का बढ़ता दुरुपयोग हो रहा है, जिससे गलत जानकारी फैलाई जाती है और चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर शंका उत्पन्न होती है। आयोग का कहना है कि ऐसे दावे अक्सर कानूनी परिणाम तक नहीं पहुंचते लेकिन मतदाता का विश्वास डगमगा सकते हैं।
इसके अलावा, मतदाता की गोपनीयता की सुरक्षा और वीडियो फुटेज के साथ छेड़छाड़ कर AI की मदद से झूठी या भ्रामक कहानियाँ गढ़े जाने की आशंका भी आयोग की चिंताओं में शामिल है।
कानूनी और प्रक्रियागत संदर्भ
रिटेंशन पीरियड (संग्रहण अवधि): भारतीय कानून के अनुसार, कोई भी नागरिक चुनाव परिणाम को चुनौती देते हुए मतदान की तिथि से 45 दिनों के भीतर चुनाव याचिका दाखिल कर सकता है। ECI का कहना है कि उसकी यह नीति इसी समयसीमा के अनुसार है।
नियम में बदलाव: दिसंबर 2024 में सरकार ने चुनाव आचरण नियमावली 1961 के नियम 93 में संशोधन करते हुए सार्वजनिक निरीक्षण से CCTV जैसी रिकॉर्डिंग को हटा दिया, जिससे ECI के इस निर्णय को और कानूनी समर्थन मिला।
नुकसान और आलोचनाएँ
हालांकि आयोग का तर्क गोपनीयता और दुरुपयोग की चिंता पर आधारित है, पर इसके कई गंभीर दुष्परिणाम और आलोचनाएँ सामने आ रही हैं।
पारदर्शिता और जवाबदेही में आएगी कमी
45 दिनों के बाद फुटेज नष्ट करने से नागरिक समाज, मीडिया और स्वतंत्र पर्यवेक्षकों को चुनाव प्रक्रिया की विस्तृत समीक्षा करने का अवसर नहीं मिलेगा। इससे पारदर्शिता कमजोर होगी, खासकर तब जब गड़बड़ियाँ या अनियमितताएँ बाद में सामने आएँ। पत्रकार और निगरानीकर्ता अक्सर चुनावी अनियमितताओं को उजागर करते हैं। अगर फुटेज 45 दिनों बाद हटा दी जाती है, तो उनकी जांच सीमित हो जाएगी। लोकतंत्र में मीडिया की यह भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है।आलोचक कहते हैं कि यह निर्णय जानबूझकर या अनजाने में हुई अनियमितताओं के साक्ष्य को नष्ट करने का रास्ता भी बन सकता है, जिससे सिस्टम पर से विश्वास उठ सकता है।
लोकतंत्र को होगा नुकसान
एक मजबूत लोकतंत्र की नींव पारदर्शिता, नागरिक भागीदारी और जवाबदेही पर टिकी होती है। अगर चुनावी प्रक्रिया की निगरानी करने के संसाधन कम हो जाएँ, तो लोकतंत्र कमजोर होता है।
भारत की लोकतांत्रिक रैंकिंग पहले से ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गिर रही है, और इस तरह के निर्णय उस गिरावट को और तेज़ कर सकते हैं।आयोग के गोपनीयता और दुरुपयोग के तर्क के जवाब में विशेषज्ञ कहते हैं कि तकनीकी उपायों, जैसे डेटा प्रोटेक्शन और वीडियो में चेहरा ब्लर करने जैसी तकनीकों से इन समस्याओं का समाधान संभव है, फुटेज नष्ट करने की आवश्यकता नहीं।
यह निर्णय भारत के लोकतंत्र के लिए क्यों हानिकारक माना जा रहा है? पारदर्शिता लोकतंत्र की आत्मा है। यदि चुनाव प्रक्रिया के सबूत खत्म कर दिए जाते हैं, तो नागरिकों और संस्थाओं को यह जांचने का मौका नहीं मिलेगा कि चुनाव निष्पक्ष और स्वतंत्र हुए या नहीं।
संतुलन और नियंत्रण की प्रणाली कमजोर होती है अगर साक्ष्य ही मिटा दिए जाएँ। इससे भविष्य में सुधार की संभावना भी कम हो जाती है। लोकतंत्र सूचकांकों में भारत को पहले ही नागरिक स्वतंत्रता और पारदर्शिता की कमी के कारण नीचे गिराया गया है। इस प्रकार के निर्णय भारत की वैश्विक छवि को और बिगाड़ सकते हैं।
हालांकि चुनाव आयोग का यह निर्णय दुरुपयोग रोकने और गोपनीयता की रक्षा के उद्देश्य से लिया गया है, पर इसके गंभीर परिणाम लोकतंत्र की सेहत पर पड़ सकते हैं। इससे पारदर्शिता, जवाबदेही और नागरिकों का विश्वास कमजोर पड़ सकता है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण लोकतंत्र में हर कदम जो निगरानी और भागीदारी को सीमित करता है, उसे सावधानीपूर्वक पुनर्विचार की आवश्यकता है। लोकतंत्र को सुरक्षित रखने के लिए निगरानी, जांच और स्वतंत्र सूचना तक पहुँच के अधिकार को सशक्त बनाना अनिवार्य है।



