हाल के दिनों में भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री सोशल मीडिया पर एक विवाद के केंद्र में आ गए हैं। एक सरकारी नीति की घोषणा की आलोचना से शुरू हुआ मामला जल्द ही व्यक्तिगत हमलों और उनके परिवार पर निशाना साधने तक पहुँच गया। यह प्रकरण सार्वजनिक बहस की सीमाओं, लोकतंत्र में नागरिकों की जिम्मेदारियों, और राष्ट्र की सेवा करने वाले अधिकारियों को ऑनलाइन दुर्व्यवहार से बचाने की तत्काल आवश्यकता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
संकट में कूटनीति
10 मई 2025 को विक्रम मिस्री ने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्धविराम समझौते की घोषणा की—यह कदम तनाव कम करने और जान-माल की क्षति रोकने के उद्देश्य से उठाया गया था। एक राजनयिक के रूप में मिस्री ने केवल सरकार का निर्णय सार्वजनिक किया, कोई निजी राय नहीं रखी। फिर भी, कुछ ही घंटों में वह सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग का निशाना बन गए।
आलोचना तीव्र थी और कई मामलों में काफी कठोर भी। कुछ ने उन पर पाकिस्तान के प्रति नरम रुख अपनाने का आरोप लगाया, तो कुछ ने उनकी देशभक्ति पर ही सवाल खड़े कर दिए। लोकतंत्र में जनसेवकों से जवाबदेही की अपेक्षा कोई नई बात नहीं है। लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह स्वस्थ बहस नहीं, बल्कि सीमाएं लांघने जैसा था।
व्यक्तिगत सीमा का उल्लंघन
जल्द ही ट्रोलिंग भद्दे और खतरनाक रूप में बदल गई। मिस्री की बेटी डिडोन मिस्री, जो लंदन में वकील हैं, को निशाना बनाया गया। ट्रोल्स ने उनके पेशे से जुड़ी झूठी अफवाहें फैलाईं, उनके निजी संपर्क विवरण साझा किए, और उन्हें भद्दी तथा स्त्री-विरोधी टिप्पणियों का शिकार बनाया। ये हमले केवल अपमानजनक ही नहीं, बल्कि खतरनाक भी थे, जिससे उनकी वास्तविक सुरक्षा खतरे में पड़ गई।
यह वह रेखा है जिसे कभी पार नहीं किया जाना चाहिए। नीतियों की आलोचना अलग बात है, लेकिन सार्वजनिक सेवकों के परिवारों को निशाना बनाना न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि हमारी नागरिकता की बुनियाद को भी कमज़ोर करता है।
दुर्व्यवहार के विरुद्ध एकजुट आवाज
नौकरशाही, राजनीतिक नेताओं और पूर्व राजनयिकों की प्रतिक्रिया सकारात्मक और साहसपूर्ण रही। वरिष्ठ IAS और IPS अधिकारी, साथ ही पूर्व विदेश सचिवों ने इन हमलों की कड़ी निंदा की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मिस्री जैसे अधिकारी चुनी हुई सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर काम करते हैं और नीति-निर्णयों के लिए उन्हें बलि का बकरा नहीं बनाया जाना चाहिए।
राजनीतिक नेताओं ने भी यह बात दोहराई है कि लोकतंत्र बहस से चलता है, व्यक्तिगत दुश्मनी से नहीं। संदेश साफ है: ऑनलाइन दुर्व्यवहार के लिए जीरो टॉलरेंस होनी चाहिए, खासकर जब वह परिवार तक पहुँचता है।
मजबूत सुरक्षा तंत्र की ज़रूरत
यह मामला कोई अकेला उदाहरण नहीं है। अब तो अक्सर ऐसा हो रहा है कि जनसेवक और उनके परिवार ऑनलाइन भीड़ का निशाना बन जाते हैं। ऐसे में सोशल मीडिया कंपनियों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों को अब और अधिक सक्रिय होना होगा। जो लोग झूठ फैलाते हैं, निजी जानकारी साझा करते हैं या दुर्व्यवहार के लिए उकसाते हैं, उनके खिलाफ तुरंत और कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।
साथ ही, जनता में भी जागरूकता बढ़ानी होगी। हमें याद रखना चाहिए कि हर अधिकारी के पीछे एक इंसान होता है—जिसके अपने परिवार, भावनाएं और निजता का अधिकार होता है।
लोकतंत्र की आत्मा की रक्षा करें
विक्रम मिस्री के साथ हुई ट्रोलिंग सोशल मीडिया की विषैली प्रवृत्ति का स्पष्ट उदाहरण है। यदि इस पर रोक नहीं लगाई गई, तो यह प्रवृत्ति देश की सेवा करने के इच्छुक योग्य लोगों को हतोत्साहित कर सकती है। एक समाज के रूप में हमें यह स्पष्ट रेखा खींचनी होगी—जोरदार बहस और अस्वीकार्य दुर्व्यवहार के बीच। हमारे जनसेवकों की गरिमा की रक्षा करना केवल व्यक्तियों की सुरक्षा नहीं, बल्कि हमारे लोकतंत्र की आत्मा को सुरक्षित रखना है।



