रविंद्र मुंडेतिया | 6 फरवरी 2026
ऊपर से किसी बालकनी से कचरे की पॉलीथिन नीचे गिरती है, कोई गाड़ी रोककर चुपके से सड़क किनारे थैला रख जाता है, कोई कोल्ड ड्रिंक पीकर बोतल फुटपाथ पर छोड़ देता है। कुछ ही किलोमीटर दूर, मुंबई के देवनार में यही कचरा धुआँ और ज़हर बनकर किसी बच्चे के फेफड़ों तक पहुंचता है। सवाल यह है कि गलती सिर्फ सरकार की है, या हम सब की भी है ?
मुंबई के देवनार में उन ज़िंदगियों की झलक देखने को मिलती है जो कचरे के बीच सांस लेते हैं। अब बारी है उस अदृश्य किरदार की, जो हर फ्रेम में है लेकिन खुद को जिम्मेदार मानने से कतराता है और वो किरदार है शहर का आम नागरिक, यानी हम और हमारी सिविक सेंस।
सिविक सेंस – इतना मुश्किल क्या है ?
सिविक सेंस कोई बहुत भारी-भरकम चीज नहीं है। इसका सीधा मतलब है – शहर के साथ शराफत से रहना। यानी वो आदतें जो किसी भी इंसान को अच्छे नागरिक बनाती हैं जैसे सार्वजनिक जगहों को अपना समझकर साफ रखना, सड़क पर कहीं भी थूकने, कचरा फेंकने, प्लास्टिक उड़ाने से बचना, कचरे को घर से निकालने से पहले सही तरह से अलग करना, ये समझना कि “मेरे घर के बाहर भी” मेरी ही जिम्मेदारी है।
अक्सर लोग कहते हैं “हम टैक्स देते हैं, सफाई करना सरकार का काम है।” सवाल यह है कि क्या टैक्स देने का मतलब ये है कि सड़क हमारी नहीं रही ? अगर सड़क पर कचरा हम ही फेंक रहे हैं, तो सिर्फ सफाई कर्मचारी को क्यों कोसें ? सिविक सेंस कोई कानून नहीं, ये हमारी जिम्मेदारी का एक अहम हिस्सा है। बोतल हाथ में रखकर डस्टबिन ढूंढना या चलते-चलते उसे नाली में फेक देना, इन दो में फर्क ही पूरे शहर की शक्ल बदल देता है।
देवनार – जब सिविक सेंस न होना, तो बीमारी बन जाती है।
देवनार डंपिंग ग्राउंड को अक्सर सिर्फ प्रशासनिक नाकामी के तौर पर देखा जाता है, लेकिन यह दरअसल उस पूरी चेन की आखिरी कड़ी है जिसकी शुरुआत हमारे घर के कूड़ेदान से शुरू होती है। मुंबई के ज्यादातर घरों में आज भी गीला–सूखा कचरा अलग नहीं किया जाता है। सब कुछ एक ही थैले में डाल दिया जाता है जैसे सब्ज़ी के छिलके, पुरानी बैटरी, मेडिकल वेस्ट, प्लास्टिक, कॉफी कप, टूटे बल्ब आदि। जब यह मिला-जुला कचरा ट्रक में भरकर देवनार पहुंचता है, तो वहाँ बैठा कोई रैगपिकर जान हथेली में रखकर उसमें से प्लास्टिक और लोहे के टुकड़े निकालता है।

अगर शहर के घरों और सोसायटी में ही कचरा गीला, सूखा और खतरनाक इन तीन हिस्सों में अलग हो जाए तो न सिर्फ देवनार का बोझ कम होगा, बल्कि वहाँ काम करने वालों की सेहत पर भी इसका असर बहुत कम हो जाएगा। अभी हालात ऐसे हैं कि देवनार की आग सिर्फ वहाँ नहीं जलती, उसकी राख शहर की हवा में घुलकर सबके फेफड़ों तक जाती है और विशेषकर देवनार को ज्यादा प्रभावित करती है। देवनार इस बात का सबूत है कि जब सिविक सेंस नहीं होता है, तो उसकी कीमत हमेशा सबसे गरीब लोग चुकाते हैं। वो लोग जो कचरे के सबसे करीब रहते हैं, या उसी में अपनी रोज़ी देखते हैं।
“सरकार कुछ नहीं करती” – क्या इतना कह देना सही है ?
देवनार की आग लगी तो घोषणाएँ भी हुईं। वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट की बातें हुईं, बायोमाइनिंग के प्लान बने, घर-घर कचरा अलग करने की अपीलें की गईं। लेकिन जमीन पर बदलाव आधा-अधूरा ही दिखा। देवनार के लोग इन सारी घोषणाओं को कभी भी जमीनी तौर पर नहीं देखें है। वे कहते है प्लांट तो बना हुआ है लेकिन सरकार जितना बताती हैं उतना कभी भी वेस्ट-टू-एनर्जी नहीं बनता है। यहाँ दो तरह की नाकामी साफ दिखती है। एक सिस्टम की और दूसरी समाज की। सिस्टम की नाकामी यह है कि सरकार प्लान बनाकर फाइल में फंस जाती है। ठेकेदारों की लापरवाही इसमें शामिल है और क्योकि सरकार इसपर ध्यान नहीं देती है लिहाजा ये प्रोजेक्ट समय पर पूरा नहीं होते है। वही दूसरी और इसमें समाज की भी नाकामी है। लोग कचरा अलग करने की जिम्मेदारी से बचना चाहते है, नियमों को मजाक में ले लिया जाता है और हर गलती का दोष सिर्फ बीएमसी पर डालकर पल्ला झाड़ लिया जाता है। किसी भी शहर को साफ रखने के लिए सिर्फ सफाई कर्मचारियों की नहीं, बल्कि लाखों नागरिकों की आदतों की भी जरूरत होती है। अगर हर घर से निकलने वाले कचरे का 70–80 प्रतिशत हिस्सा पहले ही सही तरीके से अलग हो जाए, तो डंपिंग ग्राउंड तक पहुँचने वाला असली “कचरा” बहुत कम रह जाएगा।

घर से शुरू होने वाली सफाई
सिविक सेंस की सबसे पहली पाठशाला घर है, जहाँ बच्चे देखते हैं कि बड़े क्या कर रहे हैं। अगर माँ-बाप कार की खिड़की से चिप्स का खाली पैकेट बाहर फेंकते हैं, तो बच्चे किताबों में स्वच्छता के बारे में पढ़कर भी उसे गंभीरता से नहीं लेंगे। अगर घर में डाइनिंग टेबल पर बैठकर हम देवनार की आग पर दु:ख जताते हैं, लेकिन टेबल पर पड़ा प्लास्टिक वहीं छोड़ देते हैं यह सोचकर कि ‘मेड उठा लेगी या माँ उठा लेगी’, तो संदेश साफ़ है, जिम्मेदारी हमेशा किसी और की है।
छोटे-छोटे कदम जो सच में फर्क ला सकते हैं
एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते हमें घर में दो–तीन डस्टबिन रखने चाहिए ताकि गीला, सूखा, और मेडिकल वेस्ट हम अलग रख सके। हर सोसाइटी या मोहल्ले में ‘कचरा सेगरेगेशन’ को एजेंडा बनाना चाहिए। बच्चों को हर हफ्ते एक छोटा “क्लीन-अप” टास्क देना चाहिए। अगर शहर की अगली पीढ़ी को देवनार जैसे पहाड़ नहीं चाहिए, तो उन्हें गणित और साइंस के साथ ही साथ, सिविक सेंस भी सिखाना होगा। स्कूलों में जो “स्वच्छता अभियान” एक-दो दिन के लिए नारा बनकर रह जाता हैं, उसे सालभर की प्रैक्टिस बनाया जा सकता है। जब बच्चे सवाल पूछना शुरू करेंगे कि “आपने कचरा डस्टबिन में क्यों नहीं डाला ?” उस दिन किसी शहर की हवा सच में बदलना शुरू होगी।
टेक्नोलॉजी, सोसायटी मॉडल और सामूहिक बदलाव
मुंबई जैसे शहर में, जहाँ हर मिनट भागदौड़ है, लोगों को यह लगना सामान्य है कि ‘इतना टाइम किसके पास है ?’ लेकिन टेक्नोलॉजी और अच्छे मॉडल इस गैप को थोड़ा आसान बना सकते हैं। कई हाउसिंग सोसायटी अब अपने कंपाउंड में ही वेट वेस्ट का कंपोस्ट बना रही हैं, जिससे बगीचों के लिए खाद तैयार होती है। इससे ट्रक तक जाने वाला कचरा कम होता है। “ज़ीरो वेस्ट सोसायटी” मॉडल यानी एक लक्ष्य होता है कि सोसायटी से निकलने वाले 80–90% तक कचरे का निपटान अंदर ही हो जाए, बाहर सिर्फ वही जाए जो जरूरी हो। ये सब सुनने में आदर्शवादी लगता है, लेकिन ऐसे मॉडल अभी इसी देश के कई शहरों में काम कर रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि वहाँ “सिविक सेंस” को फैशन नहीं, ज़रूरत समझा गया।
सवाल सिर्फ देवनार का नहीं, हमारा भी है
देवनार डंपिंग ग्राउंड एक तरह का दर्पण है। उसमें सिर्फ कचरा नहीं, हमारी रोज़ की लापरवाहियों के निशान दिखते हैं। वो प्लास्टिक कप जो हमने समुद्र किनारे छोड़ा, वो गुटखे का पाउच जो बस स्टॉप पर फेंका, वो मेडिकल वेस्ट जो बिना सोचे-समझे घर के कचरे के साथ निकाल दिया गया। शहर को साफ रखने की लड़ाई सिर्फ “स्वच्छ भारत” या “बीएमसी” की मुहिम नहीं हो सकती, अगर मुंबईकर खुद अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाने को तैयार न हों। सवाल यह नहीं कि देवनार कब बंद होगा, बल्कि यह है कि हम कब समझेंगे कि देवनार की आग हर उस थैले से शुरू होती है जिसे हमने बेफिक्री से कहीं भी फेंक दिया।
यह मान लेना ही शायद सिविक सेंस का मतलब है कि यह शहर सिर्फ रहने की जगह नहीं, बल्कि हमारी साझा ज़िम्मेदारी भी है। अब फैसला हमारे हाथ में है। क्या हम देवनार को सिर्फ खबरों में देखना चाहते हैं, या अपने रोज़मर्रा के फैसलों से उसकी आग थोड़ी कम करना चाहते हैं ?
रविंद्र मुंडेतिया मीडिया शोधकर्ता और लेखक हैं। समाज, राजनीति और शहरी मुद्दों पर गहन अध्ययन और लेखन करना उनका मुख्य कार्यक्षेत्र है। वे विशेष रूप से हाशिए पर खड़े समुदायों और पर्यावरणीय चुनौतियों को आवाज़ देने का काम करते हैं।



