उज्ज्वल उपमन | २१ नवंबर २०२५
यह कहानी है ममता जी की—एक साधारण-सी दिखने वाली, लेकिन असाधारण हिम्मत और दिल वाली महिला की। ममता के दो बच्चे हैं—राहुल और पूजा। पति के साथ शुरू हुई उनकी ज़िंदगी उतनी आसान नहीं थी। जिस व्यक्ति से उनकी शादी हुई, वह शराब का आदी था। वह कपड़ों की प्रेस (इस्त्री) का काम करता था, और उसकी कमाई का आधा हिस्सा शराब में चला जाता था। घर एक बड़े मकान के छोटे से गैरेज-नुमा कमरे में किराए पर था, और उतनी ही छोटी थी उनकी रोज़मर्रा की उम्मीदें।
बच्चों की पढ़ाई का तो कुछ पता ही नहीं था—कब स्कूल जाएँगे, कब फीस न भर पाने के कारण बाहर कर दिए जाएँगे—यह अनिश्चितता हर दिन बच्चों को डरा देती थी। घर का माहौल हमेशा चिंता और असुरक्षा से भरा रहता था।

वह दिन… जो सबकुछ बदल गया
एक दिन ऐसा आया जिसने उनकी ज़िंदगी को हिला कर रख दिया। लगातार शराब पीने के कारण ममता के पति को अचानक तेज़ अटैक आया। उन्हें पास के अस्पताल ले जाया गया। जो थोड़ा-बहुत पैसा घर में बचा था, सब इलाज में लग गया। पर किस्मत को कुछ और मंज़ूर था—वह बच नहीं पाए और हमेशा के लिए इस दुनिया से चले गए।
अब ममता अकेली थी—एक महिला… दो छोटे बच्चे… और सिर पर दुनिया की मुश्किलें। समाज का स्वभाव भी ऐसा नहीं कि संकट में घिरी महिला को आसानी से जीने दे। लेकिन ममता के भीतर कुछ था—अपने बच्चों को बचाने की ज़िद, और ज़िंदगी को दोबारा खड़ा करने का जज़्बा।
गिरे आँगन से उठना आसान नहीं था… पर ममता उठी
पति के जाने के बाद ममता ने उसी की छोटी-सी दुकान संभाली। उसने दुकान की दीवार पर पति की तस्वीर लगाई—जैसे हर दिन उसे देखकर खुद को मजबूत रहने की हिम्मत देती हो। उसने कपड़े प्रेस करने का काम शुरू किया।
पैसे इतने कम थे कि कुछ दिन उन्हें उसी मकान के बाहर सड़क पर रातें गुज़ारनी पड़ीं। ठंड की रातों में, जब बच्चों की ठिठुरन उसे अंदर तक चुभती थी, तभी मकान मालिक ने थोड़ी दया दिखाते हुए उन्हें एक कंबल दे दिया—ताकि रात गुज़र सके।
ये दिन उसके जीवन में सबसे कठिन थे—लेकिन यही दिन उसे सबसे मजबूत भी बना रहे थे।

नया घर, नई उम्मीद… और बच्चों का उजाला
कुछ समय बाद, ममता ने पैसे जोड़कर एक छोटा-सा मकान किराए पर लिया। वह घर भले छोटा था, पर उसमें बच्चों के लिए सुरक्षा थी, और ममता के लिए फिर से जीवन शुरू करने का विश्वास।
अब राहुल और पूजा बिना चिंता के स्कूल जाते। शाम को घर लौटकर अपनी माँ का हाथ भी बंटाते। वो सभी घरों में जाकर प्रेस किए कपड़े दे आते जहाँ से कपड़े आए थे। ये छोटे-छोटे कदम बच्चों को बचपन से ही जिम्मेदारी सिखा रहे थे।
आज… ममता की कहानी सिर्फ संघर्ष नहीं, बल्कि जीत है
आज ममता के दोनों बच्चे अच्छी तरह से ग्रेजुएशन कर रहे हैं और ज़िंदगी में आगे बढ़ रहे हैं। ममता एक माँ, एक श्रमिक, और एक योद्धा… तीनों भूमिकाएँ निभाते-निभाते खुद को एक नए रूप में गढ़ चुकी है।
उसका सिर्फ एक सपना है—
“जिन बच्चों को कभी सड़क पर सुलाया था, उन्हें अब दुनिया की हर वो सुविधा दूँ जो उनका हक़ हैं।”
उसकी आँखों में आज भी वही चमक है—आँसू भी हैं, पर उनमें डर नहीं… गर्व है। उसने गरीबी, अकेलापन, समाज की तिरछी नज़र—सब झेला, पर अपने बच्चों को कभी टूटने नहीं दिया।
विशेषज्ञों की राय
एम. के. धरानी और जे. बालामुरुगन ने जे एजुकेशन एंड हेल्थ प्रोमोशन जर्नल में प्रकाशित अपने अध्ययन में स्पष्ट रूप से बताया है कि भारत में एकल माताओं का जीवन अत्यंत संवेदनशील स्थितियों से घिरा होता है। आर्थिक संसाधनों की कमी, शिक्षा तक सीमित पहुँच और सामाजिक समर्थन के अभाव के कारण उनकी भावनात्मक और सामाजिक भलाई पर गहरा प्रभाव पड़ता है। विशेषज्ञों के अनुसार, इन परिस्थितियों में एकल माताओं को सबसे अधिक सहारा उनकी अपनी “कॉपिंग स्ट्रेटेजी” — यानी कठिन परिस्थितियों का सामना करने के उनके व्यक्तिगत तरीकों — से मिलता है। ममता की कहानी भी इसी पैटर्न को दर्शाती है। आर्थिक तंगी, सामाजिक दबाव और अकेलेपन के बावजूद उसने अपने अंदर से साहस जुटाया, अपने बच्चों की परवरिश को प्राथमिकता दी और एक-एक दिन करके संघर्षों का सामना किया। उसका धैर्य और उसकी आत्मनिर्भरता शोध में वर्णित निष्कर्षों को वास्तविक जीवन में साकार करती है
विश्व बैंक ने अपने विश्लेषण में यह रेखांकित किया है कि महिला सशक्तिकरण में उनके सामाजिक संबंधों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। भारत में सामाजिक अलगाव महिलाओं को और कमजोर करता है क्योंकि वे अक्सर सपोर्ट नेटवर्क से वंचित रह जाती हैं। ऐसे में छोटे-छोटे संबंध — पड़ोसियों, ग्राहकों या दैनिक संपर्क में आने वाले लोगों के साथ — भी उनके लिए एक महत्वपूर्ण सहारा बन जाते हैं। ममता की कहानी बताती है कि उसकी मजबूती केवल व्यक्तिगत परिश्रम का परिणाम नहीं थी; उसके कार्यस्थल और समुदाय में बने छोटे-छोटे रिश्तों ने भी उसे मानसिक और सामाजिक बल दिया, जो उसके सशक्तिकरण के आधारों में शामिल हैं।
आर्थिक विशेषज्ञों का भी मानना है कि महिला सशक्तिकरण केवल सामाजिक न्याय का सवाल नहीं, बल्कि आर्थिक विकास का प्रमुख स्तंभ है। जगरण न्यूज़ के एक संपादकीय में यह कहा गया है कि महिलाओं की आर्थिक भागीदारी और आत्मनिर्भरता किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में निर्णायक भूमिका निभाती है। वहीं विश्व बैंक की गरीबी और समानता संबंधी रिपोर्ट बताती है कि गरीब और वंचित समुदायों, विशेषकर महिलाओं, के पास संसाधनों तक पहुँच बेहद सीमित होती है और यह असमानता गरीबी की खाई को और गहरा करती है। इसी परिप्रेक्ष्य में ममता का संघर्ष केवल उसका निजी जीवन-युद्ध नहीं, बल्कि उस व्यापक सामाजिक-आर्थिक ढांचे को भी उजागर करता है जिसमें महिलाएँ अवसरों और संसाधनों की कमी से जूझती रहती हैं। उसकी उपलब्धि यह दिखाती है कि व्यक्तिगत दृढ़ता के साथ-साथ सामाजिक नीतियों और ढांचागत सुधारों का समर्थन महिलाओं को सशक्त बनाने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
ममता की कहानी सिर्फ एक माँ की नहीं, बल्कि उन सभी महिलाओं की कहानी है जो परिस्थितियों से लड़ते हुए अपने बच्चों का भविष्य लिखती हैं। यह कहानी बताती है कि मजबूती सिर्फ मांसपेशियों में नहीं होती—वह दिल में होती है, आँसुओं के पीछे छिपी होती है, और हर रोज़ दो वक्त की रोटी जुटाने वाले हाथों में बसती है।
ममता… वह नाम नहीं, एक शक्ति है।
उज्ज्वल उपमन मुंबई विश्वविद्यालय के संचार एवं पत्रकारिता विभाग से जुड़े हैं। वे सामाजिक सरोकारों, विशेषकर ग्रामीण महिलाओं की समस्याओं और सशक्तिकरण पर लेखन करते हैं। उनकी लेखनी का उद्देश्य समाज में जागरूकता और सकारात्मक बदलाव लाना है।


